Tuesday, 1 August 2017

अभिवादन

"नमस्कार ! कैसे हैं आप ?" ,यह एक सवाल और
"नमस्कार! मैं अच्छा हूँ । आप सुनाइये" । यह उसका जवाब। बच्चों से मिले तो "अरे ! कितना बड़ा हो गया ? और बेटा ! पढ़ाई कैसी चल रही है ? " आम तौर पर किसी  भी समारोह में लोग एक दूसरे से वही घिसे पिटे सवाल पूछते हैं और उनका वही घिसा पिटा जवाब पाते हैं।
मज़े की बात है कि हर भाषा , हर परिवेश के लोग जिनमें बाक़ी बातों पे कितने भी मतभेद हों मगर यहां सबका दिमाग़ एक जैसा ही चलता है । वही कहना और वही सुनना ।
मैं कई बार मजाक में लोगों से कहती हूँ ... हेलो शेलोके बजाय पूछिए ," हाल कैसा है जनाब का ?" और क्या मज़े की बात हो कि सामने वाला कहे , "क्या ख़याल है आपका ?"
कुछ अभिवादन क्षेत्रीय भाषा में होते हैं . कहीं राम राम है तो कहीं केम  छो . कहीं कसा काय है तो कहीं वणक्कम . कोई पैरिपोना कहता है तो कोई पांय लागू . 
नयी पीढ़ी एक दुसरे को हाय फाइव देती नज़र आती है . 
अभिवादन के साथ हाल चाल पूछे जाने पर एक शायर क्या खूब लिखता है . 
"उनके देखे से जो आ जाती है मुंह पे रौनक
वो समझते हैं कि बीमार का हाल अच्छा है "



Wednesday, 24 May 2017

घर

चलो . अब घर जाना होगा .एक फ़िल्मी गीत कहता है ,
"ये तेरा घर , ये मेरा घर
किसी को देखना हो गर
तो पहले आके मांग ले
मेरी नज़र तेरी नजर "
एक और गीत में जब नायिका पूछती है कि घर में लड़ने की जगह कहाँ है तो नायक कहता है " मैंने वो जगह ही नहीं बनायी "
कभी कभी किसी की घर की तलाश उम्र भर ख़त्म नहीं होती और दो दीवाने जब आशियाना नहीं बना पाते तो एक अकेला आब ओ दाना ढूंढता रह जाता है .
जावेद अख्तर साहब लिखते हैं ,
"एक ये घर जिस घर में मेरा साज़ ओ सामां रहता है
एक वो घर जिस घर में मेरी बूढ़ी नानी रहती थीं "
वही चारदीवारी कैसे नया कलेवर धारण कर लेती है , नए लोगों के साथ .नए दिन और नए मौसम में .
अमृता प्रीतम अपनी एक कहानी में एक जादू के घर की बात करती हैं जो अ और स के कहीं मिलते ही बनकर खड़ा हो जाता है और उनके दूर जाते ही गायब हो जाता है .
घर कभी सर छुपाने की जगह होता था . अब वो कभी प्रतिष्ठा का प्रश्न होता है , कभी झगडे की जड़ भी . होम लोन के भ्रमजाल ने उसे मध्यवर्ग के लिए निवेश का आकर्षक साधन बना दिया है और हर गली में इमारतें बनती दिख रही हैं .
मगर घर किसी इमारत का नामे थोड़े ही है . वह तो रिश्तों की बुनियाद पे खडा होता है और प्यार की छांव में , विश्वास की दीवारों के बीच बनता है .
घरवाली और घरवाला ही तो मकान को घर बनाते हैं . फिर न जाने क्या उलझन होती है कि "है जो जन्मों का ये रिश्ता तो बदलता क्यूँ है ? " जैसे सवाल खड़े हो जाते हैं .
और जब इस घर के वासी दो से तीन या चार होते हैं तब भी तो कहा जाता है कि घर की रौनक बच्चों से ही है . कोई यह भी लिखता है ,
"वो शाख़ है न फूल जहां तितलियाँ न हों
वो घर भी कोई घर है जहां बच्चियां न हों "
बच्चों की खिलखिलाहट और मासूम शरारत घर में जान डाल देती है . मगर ये सुख भी टिकता थोड़े ही है . वो उड़ जाते हैं , आब ओ दाना की तलाश में . नया आशियाना बनाने .
अब डिज़ाइनर होम्स की संकल्पना चल पड़ी है . सुन्दर कलाकृतियों से घर की साज सज्जा तो अच्छी बात है मगर हवा और सूर्य प्रकाश को ब्लाइंड्स से रोककर रंग बिरंगे लैम्प्स की रौशनी और ए सी की कृत्रिम हवा में घर कहीं होटल का रूप लेता दिखता है .
जैसा भी हो , दुनिया की भाग दौड़ से थके तन मन का ठौर ठिकाना तो घर ही है .
सौ बातों की एक बात है . माँ कहती हैं
 "देख लिया हमने जग सारा
अपना घर है सबसे प्यारा "




Tuesday, 9 May 2017

सीखना । सिखाना

उस दिन बच्चों के साथ कार्टून में एक चीज़ देखी । एक बच्चे की माँ किचन साफ़ करते हुए  वहां दिखी चींटियों को मारने की फिराक में है । तभी बच्चा उन चींटियों को अखबार के टुकड़े पर रखकर बाहर छोड़ देता है । चींटियां ख़ुश हो जाती हैं ।
अगले दिन एक कीड़ा देखकर बेटी चिल्लाई । इसे मार दो । मैंने कहा कि क्यों न इसे अखबार से उठाकर बाहर डाल दिया जाए . बेटी बोली . हाँ . फिर वो  खुश होगा  जैसे कार्टून में दिखाया था . उसके चेहरे की चमक देखते ही बनती  थी  .
फिर मैंने सोचा कि जीवदया या  करुणा का कितना बड़ा पाठ एक कार्टून देखकर सीखा उसने . फिर भला कार्टून देखकर बच्चे बिगड़ते हैं , ऐसा क्यूँ कहा जाए . हम लोग भी तो बचपन में कॉमिक्स पढ़ते थे . जो दौर जैसा होगा , उस दौर में बच्चे वही करेंगे . 
हाल ही में रिलीज़ एक फिल्म देखकर बच्चे संस्कृत का एक स्तोत्र गाते दिखे . तब फिर वही ख़याल आया कि इनको क्या मैं इतनी आसानी से ये सिखा सकती थी ?
तो बात नज़रिए की है . बात माध्यम की है .  मैं जो बातें अखबार में पढ़ती हूँ , वही मेरा बेटा इन्टरनेट पर पढता है . फिर हम उस पर चर्चा करते हैं . माध्यम कोई भी बुरा नहीं , अगर हम ज़िम्मेदारी के साथ बच्चों को उसका उपयोग करना सिखा दें .

Friday, 3 March 2017

पहले तोलो फिर कुछ बोलो

कितना कुछ हो रहा है . हर कोई कुछ कहने को बेचैन. सुनने , समझने वाले दिखते ही नहीं . अगर सब बोलेंगे और कोई सुनेगा नहीं तो चर्चा कैसे होगी ? बातचीत कैसे होगी ? केवल शोर ही शोर होगा . वही हो रहा है . कहीं चुनाव प्रचार का शोर . जुमलेबाजी का दौर . एक से बढ़कर एक व्यंग्य बाण . कोई पद की गरिमा भुला बैठा है तो उम्र का लिहाज़ छोड़ बैठा है . कहीं सहिष्णुता , असहिष्णुता का वाद है तो कहीं देशभक्ति और देशद्रोह का विवाद .
अब किसी को कुछ कहें भी तो कैसे . जनाब . ये अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का दौर है . सबको बोलने का , अपनी बात कहने का हक़ है . मगर क्या सचमुच ? अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता क्या अनियंत्रित स्वतंत्रता है ?
एक कहानी याद आती है . एक आदमी सड़क पर जोर जोर से अपनी छड़ी हिलाते हुए जा रहा था . अचानक उसकी छड़ी बाजू से जा रहे व्यक्ति की नाक को लगते लगते बची . वो जोर से चीखा. "अभी मुझे लग जाती . अपनी छड़ी अपने हाथ में रखो " छड़ी घुमाने वाले ने कहा,"महोदय ! मैं आज़ाद देश का आज़ाद नागरिक हूँ . मुझे अपनी छड़ी घुमाने की आज़ादी है ." " बेशक . मगर तुम्हारी आज़ादी वहां पर ख़त्म होती है जहां से मेरी नाक शुरू होती है   ." दूसरे  ने तपाक से जवाब दिया .
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को लेकर भी यही कहा जा सकता है . सबको अपनी बात अपने तरीके से कहने का अधिकार है मगर तब तक जब तक उनका अधिकार दूसरों के सम्मान , सुरक्षा और गोपनीयता  के अधिकार का उल्लंघन नहीं करता , समाज में शांति और व्यवस्था को भंग नहीं करता .
समाज में शांति और व्यवस्था ,ये एक दूसरा संवेदनशील प्रश्न है . हमारी सहनशीलता दिनों दिन कम होती जा रही है . हंसी मजाक में बड़ी बड़ी बातें ये देश सुन भी लेता था और पचा भी लेता था मगर अब इसकी श्रवण शक्ति और हाजमा दोनों ही ख़राब हो गए हैं .
सोशल मीडिया ने यूँ तो कहने को अभिव्यक्ति की आज़ादी दे दि है या उसका दायरा बढ़ा दिया है मगर यहाँ कान के कच्चे , याददाश्त से कमज़ोर धारदार जुबां वालों की कमी नहीं . देश की हालत पे सामान्य सी चिंता व्यक्त कर दे कोई तो असामान्य स्थिति पैदा हो जाती है .युद्ध का विरोध , देशद्रोह नज़र आने लगता है .
सोशल मीडिया के ये तथाकथित ट्रोलर्स जैसे राह देखते ही बैठे हैं कि कोई ज़रा सा politically incorrect हो जाए और उसपे टूट पडें । 
इनसे कैसे जूझे कोई । क्या ऋषि कपूर साब की तरह बन्दूक तान दी जाय या रामगोपाल वर्मा की तरह मोटी चमड़ी के होने का दावा कर दिया जाए । 
ये तो बड़ी पुरानी रीत है ,"कुछ तो लोग कहेंगे , लोगों का काम है कहना" 
कहने वालों की जुबां कौन बंद कर पाया है मगर उनकी आलोचना हमें depress न कर दे , इसलिए हिंदी के प्रसिद्द कवि भवानी प्रसाद मिश्र की एक बात ध्यान रखी जानी चाहिए । उन्होंने बाल कवि बैरागी को आलोचकों से भयभीत न होने की सलाह देते हुए लिखा था,  " इस बात की परवाह न करो कि कौन क्या कहता है । धरती पर आज तक एक भी आलोचक का स्मारक नहीं बना"
तो अभिव्यक्त होने वाले यह याद रखें जो फैज़ ने कहा था
बोल कि लब आज़ाद हैं तेरे...
बोल जुबां अब तक तेरी है
हाँ । मगर यह ख़याल भी रखना ज़रूरी है 
पहले तोलो फिर कुछ बोलो
लफ्ज़ कोई बेकार नहीं है

Monday, 30 January 2017

ब्लॉग लिखना शुरू किया तो एक सखी का आदेश हुआ कि भारतीय भाषाओँ पर कुछ लिखो . ओह. भाषा और साहित्य. इस पर क्या कुछ नहीं लिखा गया और कहा गया परन्तु कितना कुछ करना बाक़ी है .कागज़ तो कई काले कर दिए गए परन्तु चित्र उज्जवल न हुआ .
कुछ दिन पहले अमिताभ बच्चन जि ने एक बात पर चिंता जताई थी कि हिंदी फिल्मों में काम करने आ रही नयी पीढ़ी के हाथ में रोमन में लिखी स्क्रिप्ट होती है . काम हिंदी फिल्मों में कर रहे हैं मगर देवनागरी लिपि को पढने में असमर्थ हैं या उसे कठिन पाते हैं सो रोमन में यानि अंग्रेजी की लिपि में लिखवा लेते हैं . यदि यही हाल रहा तो हमारी लिपि खो जाएगी . ऐसी ही बात एक प्रसिद्द मराठी अभिनेता ने मराठी इंडस्ट्री की युवा पीढ़ी के बारे में कही . मुझे लगता है कि यह चिंता भारत की अन्य भाषाएँ बोलने वाले बुजुर्गों की भी होगी कि क्या एक दिन सारी भारतीय भाषाएँ रोमन लिपि में लिखी जाएँगी ? अब तक हिंदी का विरोध करने वाले या हिंदी को थोपने का विरोध करने वाले अब जाकर शायद महसूस कर रहे हैं कि भारतीय भाषाओँ को खतरा एक दुसरे से नहीं , विदेशी भाषा और लिपि के वर्चस्व से  है .
खतरा पहचान तो लिया गया है . अब उस पर कुछ काम भी तो करना होगा . वैसे यह भी सही है किअंग्रेजी अन्तरराष्ट्रीय भाषा है . हमारा अंग्रेज़ीदां होना हमारे लिए लाभदायक है . चीन से इस एक बात में तो हम आगे हैं कि हम लोगों की अंग्रेजी बड़ी अच्छी है . मगर अंग्रेजी तो दिमाग को चाहिए. दिल का क्या ? उसके लिए तो अपनी बोली , अपनी भाषा चाहिए ही .  शुरुआत घर से करनी होगी . बच्चों को अनिवार्य करें कि मातृभाषा के अखबार का एक पेज अवश्य रोज़ पढ़ें . अपनी भाषा में उनसे सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर संदेशों का आदान प्रदान करें . यह एक छोटी परन्तु सार्थक पहल हो सकती है .
चलिए. मातृभाषा की बात यों हुई. राजभाषा हिंदी का क्या ? ( राष्ट्रभाषा नहीं लिखा क्यूंकि जानकार कहते हैं कि आधिकारिक शब्द तो राजभाषा है . ) 
शुरुआत यों होनी चाहिए कि हिंदी दिवस मनाने की बजाय भारतीय भाषा दिवस मनाया जाए . हिंदी वाले कम से कम एक प्रांतीय भाषा सिखने का प्रयास अवश्य करें ताकि दुर्भावनाओं को कम किया जा सके और दूरियां घटें. सरकारी औपचारिकताओं ने हमारी भाषाओँ का कितना भला किया है , यह बात तो सर्वविदित ही है . भाषा ह्रदय में उपजती है . उसका संवर्धन हृदयहीन प्रशासन से करने की अपेक्षा क्यूँ की जाए ?
एक सर्वेक्षण में कहा गया था कि अहिन्दी भाषियों को हिंदी किसी सरकारी अभियान ने उतनी नहीं सिखाई जितनी अमिताभ के संवादों और लता जी के गीतों ने सिखाई है . बात अतिशयोक्तिपूर्ण हो सकती है परन्तु झूठ नहीं . भाषा के भेदभाव संगीत की स्वरलहरियों और रुपहले परदे के ग्लैमर में वाक़ई धूमिल पड़ते दिखते हैं .
साहित्य और संगीत वो पुल है जो भाषाओँ के किनारों को जोड़ सकता है .
हमारे कार्यालय में एक बार एक दक्षिण भारतीय युवक प्रशिक्षण के लिए आया . उसका नाम पढ़कर हम लोग चौंक गए . नाम था - तन्हाई . जब पूछा कि भला यह किस भाषा का शब्द है ? उत्तर मिला - उर्दू का . फिर आपका नाम उर्दू  का कैसे ?  पता चला कि उसकी माँ ग़ज़लों का शौक़ रखती थीं . एक ग़ज़ल का ये शब्द उन्हें भाया तो बेटे का यही नाम रख दिया . कितनी प्यारी सी बात है . 
अब तो नामों में भी विदेशी भाषाओँ ने घुसपैठ कर ली है . रुसी , यूनानी और ग्रीक नाम लोगों को बड़े भा रहे हैं . कभी बच्चों के नाम देवी देवताओं के नाम पे या सीधे सरल शब्दों में रखे जाते थे . किसी उपन्यास के नायक या नायिका का नाम भी प्रचलन में आता था पर अब कुछ अजब गजब शब्दों वाले नाम रखने का चलन है .
हम लोग अब बहुत डिजिटल हो चले हैं . वर्चुअल वर्ल्ड में ज्यादा रहते हैं . अपनी भाषा से वहाँ नाता जोड़े रखना मुश्किल नहीं . कई टाइपिंग टूल्स हैं जिनका इस्तेमाल करके भारतीय भाषाओँ में टाइपिंग की जा सकती है . परन्तु थोड़ी कोशिश करनी होती है .
 दुष्यंत कुमार की एक कविता है :

उड़ते हुए गगन में
परिन्दों का शोर 
दर्रों में, घाटियों में
ज़मीन पर
हर ओर...
एक नन्हा-सा गीत
आओ
इस शोरोगुल में
हम-तुम बुनें, 
और फेंक दें हवा में उसको 
ताकि सब सुने, 
और शान्त हों हृदय वे
जो उफनते हैं
और लोग सोचें
अपने मन में विचारें
ऐसे भी वातावरण में गीत बनते हैं।
गीत भी बनेंगे . कहीं से कुछ शुरुआत हो . सकारात्मक सोच हो .


Tuesday, 17 January 2017

गाँधी के बहाने

पिछले दिनों एक सरकारी खाते की डायरी और केलिन्डर से बापू की तस्वीर हट गयी तो इस तथ्य के समर्थन और विरोध में बयानबाजियों का दौर शुरू हो गया . बात के दो पक्ष हैं. तस्वीर के दो पहलू हैं . पहली बात ये है कि क्या गाँधी और गांधीवाद को प्रचार प्रसार के लिए इन प्रतीकों की आवश्यकता है ? जो गांधीवाद को जीते हैं , वो इन बातों से परे हैं , इससे ऊपर हैं . उन्हें अपने लिए किसी प्रतिक की आवश्यकता महसूस नहीं होती . ये लोग सिर्फ भारत में नहीं , पूरी दुनिया में हैं . वो उद्योगपति , जिसकी संपत्ति का अधिकांश हिस्सा चैरिटी में इस्तेमाल हो रहा है , वो युवा जो ऊँची तनख्वाह वाली नौकरी को छोड़कर किसी दूरदराज़ के गांव में ओर्गानिक खेती और शिक्षा के प्रसार में लगे हैं , वो वैज्ञानिक जो ए सी लैब में नहीं बल्कि घने जंगलों में कोई प्रयोग कर रहा है , वे लोग जो minimalist movement ( कम से कम साधनों में जीना ) के अगुआ हैं , वे विद्यार्थी जो अपनी छुट्टियों में ग़रीब विद्यार्थियों को पढ़ाते हैं , वो अधिकारी जिसने मलाईदार पोस्टिंग छोड़ के चुनौतीपूर्ण काम स्वीकारा है - ये सब लोग जाने अनजाने गाँधी के रस्ते पे चल रहे हैं .ये सब गाँधी के सपनों के उस भारत का निर्माण कर रहे हैं जिसके बारे में पंडित भवानी प्रसाद मिश्र ने लिखा था :
"जिसमें हर छोटा बड़ा बने
जिसमें हर अदना आला हो
जिसमें हर घने अँधेरे में
सूरज का प्रगट उजाला हो
जिसमें हर खोटा बने खरा
जिसमें हर खाली भर जाये
जिसमें रख जान हथेली पर
डरपोक ख़ुशी से मर जाय
इस बात का दूसरा पहलू ये है की डायरी और कैलेंडर जैसे प्रतीकों में आकर क्या कोई गाँधी सा कालजयी हो सकता है ? ये तो वो युग है जब लोगों की याददाश्त फेसबुक और ट्विटर का डीपी बदलते ही कम हो जाती है .२४ hrs चलने वाले न्यूज़ चैनल हर घडी किसी ब्रेकिंग न्यूज़ की तलाश में हैं . और आम जनता की याददाश्त तो कमज़ोर ही रही है तभी तो हर चुनाव में पिछली धोखाधड़ी को भूलकर वो नए वादों पर यकीन कर बैठती है . तब इन प्रतीकों के मायने ही कितने रह जाते हैं . कहीं ये नए विवाद की आड़ में पुरानी ग़लतियों पे पर्दा डालने की कोशिशें तो नहीं हैं ?
गांधीवाद के स्वनामधन्य रक्षक , अपने दंभ और आडम्बर के शिकार नेता , ख़बरों की तलाश में पत्रकार - इन सबसे अलग है देश का आम आदमी , जो खुद को भुलावा दिए जाने की कोशिशों का कभी कभी शिकार बन भी जाता है मगर समय आने पर उसे कमतर आंकने वालों को चौंका भी देता है . आखिर "ये पब्लिक है , ये सब जानती है "

Thursday, 12 January 2017

राष्ट्रीय युवा दिवस

आज राष्ट्रीय युवा दिवस है . स्वामी विवेकानंद की जयंती . वो युवा सन्यासी जिन्होंने  विश्व  धर्म सम्मलेन में अपने पहले वाक्य से ही श्रोताओं का ह्रदय जीत लिया था . अब तक "देवियों और सज्जनों " का औपचारिक सा संबोधन सुनते आ रहे अमरीकी नागरिक "मेरे अमरीका वासी भाइयो और बहिनों " का आत्मीय संबोधन सुनते ही अभिभूत हो गए और कुछ पल तक हाल तालियों की गडगडाहट से गूंजता रहा . उनके वो शब्द साधारण शब्द नहीं थे . वो भारतीय संस्कृति के उस आदर्श वाक्य  की गूँज थे , प्रतिध्वनि थे , जिसे हम "वसुधैव कुटुम्बकम " कहते हैं . सारी धरती मेरा परिवार है . यह केवल एक उद्घोष नहीं. भारत ने इस आदर्श को सदियों से जिया है . सारी दुनिया में जिसे तिरस्कृत किया गया , उसे भी भारत ने गले लगाया और अपनाया. यह विशाल हृदयता हमारी संस्कृति की आत्मा है . यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि आज हम इस बात को भूल चुके हैं .
स्वामी विवेकानंद भारत को अंधविश्वासों और कुरीतियों से मुक्त देखना चाहते थे . सर्व समावेशी वैदिक धर्म का पुनरुत्थान उनका उद्देश्य था. कहाँ हैं वे नौजवान ,जो उनके आदर्शों को अपनाएं ? क्यूँ सोयी है वह युवा पीढ़ी , जिसे दुनिया को जागृत करना है ?
युवाओं से उम्मीदें बहुत लगायी जाती हैं किन्तु उनके सामने आदर्शों की कमी है . हर क्षेत्र में व्याप्त भ्रष्टाचार और अनियमितताओं ने अधिकतर युवाओं के मन में "कोऊ नृप होई ,हमहीं का हानि " जैसी उदासीनता की भावना भर दी है . अब अनिश्चितता और भटकाव के कुरुक्षेत्र में खड़े अर्जुन को मार्ग दिखने कौन कृष्ण आएगा ? संभवतः उन्हें अपने दीपक आप बनना होगा .