कितना कुछ हो रहा है . हर कोई कुछ कहने को बेचैन. सुनने , समझने वाले दिखते ही नहीं . अगर सब बोलेंगे और कोई सुनेगा नहीं तो चर्चा कैसे होगी ? बातचीत कैसे होगी ? केवल शोर ही शोर होगा . वही हो रहा है . कहीं चुनाव प्रचार का शोर . जुमलेबाजी का दौर . एक से बढ़कर एक व्यंग्य बाण . कोई पद की गरिमा भुला बैठा है तो उम्र का लिहाज़ छोड़ बैठा है . कहीं सहिष्णुता , असहिष्णुता का वाद है तो कहीं देशभक्ति और देशद्रोह का विवाद .
अब किसी को कुछ कहें भी तो कैसे . जनाब . ये अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का दौर है . सबको बोलने का , अपनी बात कहने का हक़ है . मगर क्या सचमुच ? अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता क्या अनियंत्रित स्वतंत्रता है ?
एक कहानी याद आती है . एक आदमी सड़क पर जोर जोर से अपनी छड़ी हिलाते हुए जा रहा था . अचानक उसकी छड़ी बाजू से जा रहे व्यक्ति की नाक को लगते लगते बची . वो जोर से चीखा. "अभी मुझे लग जाती . अपनी छड़ी अपने हाथ में रखो " छड़ी घुमाने वाले ने कहा,"महोदय ! मैं आज़ाद देश का आज़ाद नागरिक हूँ . मुझे अपनी छड़ी घुमाने की आज़ादी है ." " बेशक . मगर तुम्हारी आज़ादी वहां पर ख़त्म होती है जहां से मेरी नाक शुरू होती है ." दूसरे ने तपाक से जवाब दिया .
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को लेकर भी यही कहा जा सकता है . सबको अपनी बात अपने तरीके से कहने का अधिकार है मगर तब तक जब तक उनका अधिकार दूसरों के सम्मान , सुरक्षा और गोपनीयता के अधिकार का उल्लंघन नहीं करता , समाज में शांति और व्यवस्था को भंग नहीं करता .
समाज में शांति और व्यवस्था ,ये एक दूसरा संवेदनशील प्रश्न है . हमारी सहनशीलता दिनों दिन कम होती जा रही है . हंसी मजाक में बड़ी बड़ी बातें ये देश सुन भी लेता था और पचा भी लेता था मगर अब इसकी श्रवण शक्ति और हाजमा दोनों ही ख़राब हो गए हैं .
सोशल मीडिया ने यूँ तो कहने को अभिव्यक्ति की आज़ादी दे दि है या उसका दायरा बढ़ा दिया है मगर यहाँ कान के कच्चे , याददाश्त से कमज़ोर धारदार जुबां वालों की कमी नहीं . देश की हालत पे सामान्य सी चिंता व्यक्त कर दे कोई तो असामान्य स्थिति पैदा हो जाती है .युद्ध का विरोध , देशद्रोह नज़र आने लगता है .
सोशल मीडिया के ये तथाकथित ट्रोलर्स जैसे राह देखते ही बैठे हैं कि कोई ज़रा सा politically incorrect हो जाए और उसपे टूट पडें ।
इनसे कैसे जूझे कोई । क्या ऋषि कपूर साब की तरह बन्दूक तान दी जाय या रामगोपाल वर्मा की तरह मोटी चमड़ी के होने का दावा कर दिया जाए ।
ये तो बड़ी पुरानी रीत है ,"कुछ तो लोग कहेंगे , लोगों का काम है कहना"
कहने वालों की जुबां कौन बंद कर पाया है मगर उनकी आलोचना हमें depress न कर दे , इसलिए हिंदी के प्रसिद्द कवि भवानी प्रसाद मिश्र की एक बात ध्यान रखी जानी चाहिए । उन्होंने बाल कवि बैरागी को आलोचकों से भयभीत न होने की सलाह देते हुए लिखा था, " इस बात की परवाह न करो कि कौन क्या कहता है । धरती पर आज तक एक भी आलोचक का स्मारक नहीं बना"
तो अभिव्यक्त होने वाले यह याद रखें जो फैज़ ने कहा था
बोल कि लब आज़ाद हैं तेरे...
बोल जुबां अब तक तेरी है
हाँ । मगर यह ख़याल भी रखना ज़रूरी है
पहले तोलो फिर कुछ बोलो
लफ्ज़ कोई बेकार नहीं है